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बेवफा | sad poetry in hindi

एक बेवफा ने मुझको ऐसे भुला दिया टुटा हो कोई घर उसको जला दिया जलते हुए घर से लपटें निकल रही मानो ये आग आज मेरे दिल में लग रही देखा ना बेवफा ने सबकुछ जला दिया यादें सब जला दी , सपना जला दिया दिल का हर इक कोमल भाव जला दिया वो ख्वाबों का मंडप , महल जला दिया सिर बचा है पर सेहरा जला दिया एक बेवफा ने मुझको ऐसे भुला दिया काँटों से सजी सेज उस पर सुला दिया काँटे ये सेज के दिल मेरा भेदते सोचता हूँ आज ये केसा सिला दिया आँखों से आखरी अश्क तक बहा दिया मुस्कराते चेहरे पर गम को सजा दिया एक बेवफा ने मुझको ऐसे भुला दिया हंसना था हमको संग पर उसने रुला दिया कवि - महेश "हठकर्मी " bewafaa (बेवफा  कविता )  एक  sad poetry in hindi  है  इसमे  lover की बेवफाई को दर्शाने का प्रयास किया गया है। इसे पढ़े और यदि आपको पसंद आये तो  कवि का उत्साहवर्धन करें।

कर्ज ( Karz ) |Hindi Poetry

Karz - Hindi Poetry कुछ कर्ज है हम पर आज भी  जो हम चूका नहीं पाये  सम्मान क्या देंगे हम उनकी शहादत को  जिनके सजदे में सिर तक झुका नहीं पाये उनको सपनों में जंजीर दिखती थी  मेरी माँ भारती की पीर दिखती थी लड़ने को दुश्मनो से शमशीर दिखती थी  जिंदगी उन्हें कभी दिखी ही नहीं  उन्हें वतन पे मरने में अनोखी जीत दिखती थी  हम उनके जैसे कैसे बनेंगे  हम तो पदचिन्हों पर चल भी नहीं पाये  वो वतन को दिलों जान दे गए  हम वतन....... "मेरा वतन" कह भी नहीं पाये चोटिल थे पैर तो डगमगाकर चले वो  त्योरियों को अपनी तनतना कर चले वो  होश दुश्मनों के हरदम उड़ाकर चले वो  उनकी बराबरी हमसे होगी भी कैसे  फाँसियों के फंदों पे मुस्कराकर चढ़े वो  चढ़कर फंसियों पर भी वो "इंकलाब बोले" हम आजाद होकर "जय हिन्द" ढंग से बोल नहीं पाये  वो लोग कुछ और थे जो मिट गए वतन पर  और हम है जो वतन के हो ही नहीं पाये    कवि - महेश "हठकर्मी" कर्ज ( Karz ) |Hindi Poetry हमारे शहीदों के बलिदान की छोटी स...

प्यार की हदे

कहने को यू तो थी बातें कई , पर तुमसे कहना पाए कभी रहना था हमको साथ मगर , रहकर भी रह ना पाए कभी जाने को यू तो गए मौंसम कई, मौंसम-ए-जुदाई क्यों जाता नहीं महफिले भी गई, रुसवाई हुई, क्यों वर्षो की ऐसे जुदाई हुई अरमान दिल के जम से गए, जुदाई के गम से सहम से गए मौंसम गुजरते रुक से गए, लम्हा गुजरते थम से गए तुम भी तो हममें रम से गए, हाँ लम्हा गुजरते थम से गए उन लम्हों को कैसे भुलायेंगे हम, चाहा था तुमको ही चाहेंगे हम जो लौटे अभी फिर ना आयेंगे हम, तुमको कभी न फिर सतायेंगे हम मिल ना सके इस जहाँ में तो क्या, यादों में नित मिलने आयेंगे हम चाहें टुकड़ो में दिल के बिखर जाये हम, फिर भी चाहा था तुमको ही चाहेंगे हम दूर हुई है देहे हमारी, पर तुमसे दिल दूर कैसे ले जाये हम चाहा था तुमको जाँ से भी ज्यादा, जां मेरी तुमको ही चाहेंगे हम रूठी है हमसे आज किस्मत हमारी, कैसे ? ऐसे ही तुमको भुलायेंगे हम हमको यकि है चाहत पे अपनी, अब यादों में दुनिया बसायेंगे हम दूर हुए है हम तुमसे मगर, यादों में साथ जिए जायेंगे हम दुनिया की रस्में निभा ना सके , पर प्रेम की...