आज कल खुद को भटका रहा हूँ जहाँ छूट गया था रास्ता वहीं लौटकर आ रहा हूँ मुश्किल था यूँ लौट कर आना जो उठ गए थे कदम उन्हें पीछे हटाना खुद को यूँ कहीं से ढूंढ कर ला रहा हूँ जहाँ छूट गया था रास्ता वहीं लौटकर आ रहा हूँ शायद सपनो की बाहों में खो गया था कुछ बातों में उलझकर रह गया था आज उलझनों को तोड़कर आ रहा हूँ जहाँ छूट गया था रास्ता वहीं लौटकर आ रहा हूँ सब छोड़ गए साथी पर हम ना भागे हठ की थी हमने बढ़ने की आगे आज हठ तोड़कर लौटकर आ रहा हूँ जहाँ छूट गया था रास्ता वहीं लौटकर आ रहा हूँ बढ़े थे पाने को जिसको अब वो मंजिल नहीं है इस कस्ती का अब कोई साहिल नहीं हैं अब सब भूलकर लौटकर आ रहा हूँ जहाँ छूट गया था रास्ता वहीं लौटकर आ रहा हूँ कवि - महेश "हठकर्मी " प्रिय पाठकों , यदि कविता आपको पसंद आये और आप आगे भी ऐसी कविताएँ पड़ना चाहते हैं तो कृपया हमारे Website को Subscribe करें ताकि कोई भी नयी कविता आने पर आपको तुरंत Update मिल जाये। लौटकर आ रहा हूँ ( Loutkar Aa Rha Hun ) | Hindi Poetry | motivational poem कविता उत्साहवर्धक कविता है जो भटक...
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