सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

Hindi poetry लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मैं तो एक शायर हूँ ( Main to ek shayar hun ) | Hindi poetry

मैं तो एक शायर हूँ मैं तो एक शायर हूँ सबकुछ सह लूँगा अपना दर्द अपने शब्दो से कह लूँगा तू बता ये सबकुछ सहेगी कैसे हुए अगर हम जुदा तो जुदा रहेगी कैसे गम इसका मुझको भी होगा तुझको भी होगा पर ये दर्द-ए-दिल हम सहेंगे कैसे जुदा हो गए तो जुदा रहेगें कैसे दूर हो या पास जुदाई तो होगी जुदा हुए तो रुसवाई भी होगी इस जुदाई के आलम में एक दूजे की धड़कन सुनेगें कैसे जुदा हो गए तो जुदा रहेंगे कैसे मैं तुम्हे अपना सबकुछ बना ही चूका हूँ आगामी जीवन के सपने सजा ही चूका हूँ जो टूटे ये सिलसिले तो वो सपने टूटेंगे कैसे जुदा  हो गए तो जुदा रहेंगे कैसे जो सपने टूटना है टूटे, यूँ रब रूठना है रूठे दुआ तो यही हैं तेरा संग कभी न छूटे संग छूटा तो टुकड़े दिल के समेटेंगे कैसे जुदा हो गए तो जुदा रहेंगे कैसे कवि - महेश "हठकर्मी " प्रिय पाठकों , यदि कविता आपको पसंद आये और आप आगे भी ऐसी कविताएँ पड़ना चाहते हैं तो कृपया हमारे Website को Subscribe करें ताकि कोई भी नयी कविता आने पर आपको तुरंत  Update मिल जाये। एवं पाठक गणों  कविता पसन्द आये तो आपने मित्रों के साथ share करे। ...

दीवारे ( Diware ) | Hindi Poem | Hindi poetry

मेरे रूम की दीवारे मेरी दोस्त हैं जब मैं तन्हा होता हूँ इनसे बात करता हूँ ये सब सुनती हैं,  फिर भी चुप रहती हैं न कभी ये हँसती हैं मुझ पर, न कभी मुझे चिढ़ाती हैं कभी जो गुमसुम भी हूँ  मैं न ये मेरे गम को ठिठोली बनाती हैं काश इंसान भी इनके जैसा होता ये पत्थर तो हैं परन्तु पत्थर नहीं हैं काश इंसान का दिल भी पत्थर न होता ये मूक हैं कभी बोल नहीं सकती अपनी भावनाएँ शब्दों में तोल नहीं सकती काश इंसान भी इनसे कुछ  सिख पाता अपने शब्दों को तोलकर बोल पाता ये रूम की छत को उठाये हुए हैं भार छत का है स्वयं में समाये हुए हैं काश इंसान भी इन सा बन पाता भार किसी का भी हो स्वयं उठा पाता जरुरत में किसी के काम आता ये दीवारे मुझे बहुत कुछ सिखाती रहती हैं दोस्त जो ठहरी राहें बताती रहती हैं कवि - महेश "हठधर्मी" प्रिय पाठकों , यदि कविता आपको पसंद आये और आप आगे भी ऐसी कविताएँ पड़ना चाहते हैं तो कृपया हमारे Website को Subscribe करें ताकि कोई भी नयी कविता आने पर आपको तुरंत  Update मिल जाये।  दीवारे ( Diware ) | Hindi Poem | Hindi poetry कविता एक Inspirati...

भगवा ( Bhagva ) | Hindi poetry

भगवा केवल रंग नहीं हैं ये अभिमान हमारा हैं सदियों से जिसने दिया प्रेम का वो संदेश हमारा है                                              भगवा क्षमाशीलता, प्रेम, बंधुत्व विशाल ह्रदय परिचायक हैं भगवा को अब रंग न कहना भगवा सर्वोच्च गुण अधिनायक है भगवा क्या क्या सिखलाता ये जान अगर तुम जाओगे फिर भगवा केवल रंग न होगा तुम भगवा रंग रंग जाओगे राणा की प्रेरणा भगवा है संकल्प शिवा का भगवा है आजाद हुए हर एक कण में जो लिखा हुआ वो भगवा है जो स्त्री सम्मान करे जो हर धर्म का मान करे जो ह्रदय दया का भाव भरे जो कभी नहीं भेदभाव करे ये सब भगवा ही भगवा है हाँ मेरा तन मन भगवा है हाँ मेरा जीवन भगवा है भगवा के सर्वोच्च गुणों में जो भी रंगा वो भगवा है भगवा का मतलब पहचानों भगवा को रंग ना तुम मानों भगवा संताप मिटाता है "वसुदेव कुटुंबकम" जैसा नारा भगवा ही दे पाता है भगवा केवल हिन्दू  नहीं हैं धर्मं यह पर बिंन्दु नहीं है भगवा की पहचान यहीं करता सद्गुण में...

लौटकर आ रहा हूँ ( Loutkar Aa Rha Hun ) | Hindi Poetry | motivational poem

आज कल खुद को भटका रहा हूँ जहाँ छूट गया था रास्ता वहीं लौटकर आ रहा हूँ मुश्किल था यूँ लौट कर आना जो उठ गए थे कदम उन्हें पीछे हटाना खुद को यूँ कहीं से ढूंढ कर ला रहा हूँ जहाँ छूट गया था रास्ता वहीं लौटकर आ रहा हूँ शायद सपनो की बाहों में खो गया था कुछ बातों में उलझकर रह गया था आज उलझनों को  तोड़कर आ रहा हूँ जहाँ छूट गया था रास्ता वहीं लौटकर आ रहा हूँ सब छोड़ गए साथी  पर हम ना भागे हठ की थी हमने बढ़ने की आगे आज हठ तोड़कर लौटकर आ रहा हूँ जहाँ छूट गया था रास्ता वहीं लौटकर आ रहा हूँ बढ़े थे पाने को जिसको अब वो मंजिल नहीं है इस कस्ती का अब कोई साहिल नहीं हैं अब सब भूलकर लौटकर आ रहा हूँ जहाँ छूट गया था रास्ता वहीं लौटकर आ रहा हूँ कवि - महेश "हठकर्मी " प्रिय पाठकों , यदि कविता आपको पसंद आये और आप आगे भी ऐसी कविताएँ पड़ना चाहते हैं तो कृपया हमारे Website को Subscribe करें ताकि कोई भी नयी कविता आने पर आपको तुरंत  Update मिल जाये। लौटकर आ रहा हूँ ( Loutkar Aa Rha Hun ) | Hindi Poetry | motivational poem    कविता उत्साहवर्धक कविता है जो भटक...

प्रयास करो ( Prayaas Karo ) | Motivational Poetry in Hindi

प्रयास करो प्रयास करो जब तक हारो लगातार करो बिना लड़े जीत या हार नहीं होती यूँ ही तूफानों से नौका पार नहीं होती नाविक जब हिम्मत लाता हैं नौका तूफा में पार ले जाता हैं चींटी जब जिद पर आती हैं सौ गुना भार ले जाती हैं हठ चींटी सी पाओ तुम अर्जुन का तीर बन जाओ तुम जब तक ना लक्ष्य पाओ तुम हर विराम तज जाओ तुम यूँ न डरकर घने अंधेरों से तुम हिम्मत का त्याग करो प्रयास करो , प्रयास करो जब तक हारो लगातार करो नभ पर सूरज सा चढ़ जाओ तम से किरणों सा लड़ जाओ अपने को तुम पहचानों अब क्षमताओं को अपनी निखारों अब अब पथ पे न पीछे पाँव हटे हो मुश्किल कितनी भी रहो डटे प्रयास करो अब बार-बार एक दिन लक्ष्य को पाओगें पाकर अम्बर पर छाओगें न यूँ हारों से धैर्य खोकर आशाओं का विनाश करो प्रयास करो , प्रयास करो जब तक हारों लगातार करो कवि - महेश "हठधर्मी" प्रिय पाठकों , यदि कविता आपको पसंद आये और आप आगे भी ऐसी कविताएँ पड़ना चाहते हैं तो कृपया हमारे Website को Subscribe करें ताकि कोई भी नयी कविता आने पर आपको तुरंत  Update मिल जाये। प्रयास करो ( Prayaas Karo ) | Motivational P...

अन्नदाता ( Annadata ) | Hindi poetry

हे  अन्नदाता अन्न तेरा खाके हम बड़े हुए हम बड़े आगे को लेकिन तुम हो अब भी वही खड़े मेहनत से उपजा अन्न तेरा ,देश को जीवन नया दे जाता है पर मूल्य उस ही अन्न का ,घर तेरे खुशियां नही ला पाता है कभी कभी तो कुदरत भी तुझ पर कहर बनकर टूटती सूखा कभी ,कभी बाढ़ आके सपनों को तेरे तोड़ती पर तू है जिद्दी मेहनती कभी मानता ना हार है हो बाढ़ , सूखा या अकाल उपजा के रहता अनाज है तू बंजर भूमि पर जब मेहनत से हल चलाता है जहाँ उपजा न करता झाड़ था , आज वहां अनाज लहराता है उपजाये तेरे इसी अन्न से फल फूलता ये समाज है फिर भी न सर पे पगड़ी तेरे , पाँव में न खड़ाव है कहने को भले ही तुझपे दुनिया का लाखों का कर्ज उधार है पर वास्तविकता में , हे अन्नदाता कर्ज तेरा हम सभी पर उधार हैं आधार हैं तू हर देश का , तू है तो ये संसार हैं कवि - महेश "हठधर्मी" प्रिय पाठकों , यदि कविता आपको पसंद आये और आप आगे भी ऐसी कविताएँ पड़ना चाहते हैं तो कृपया हमारे Website को Subscribe करें ताकि कोई भी नयी कविता आने पर आपको तुरंत  Update मिल जाये।  अन्नदाता ( Annadata ) | Hindi poetry...

आखरी काफिला ( Aakhari Kafeela ) | Hindi poetry

आज कफन ओढ़कर हम जिधर चल दिए आखरी में सभी उधर आयेंगे कोई आज चल दिया , कोई कल आयेगा आखरी में काफ़िले सब उधर आयेंगे मंजिले है कई जिंदगी की मगर मौत के बाद तो सब उधर आयेंगे मुश्किलें है कई राहों में खड़ी कभी दुःख है कहीं , कभी सुख की घड़ी जी लिये जो मिले हमको पल थे सभी अब न पल हैं बचें जो गवां पायेंगे आज कफ़न ओढ़कर हम जिधर चल दिये आखरी में सभी उधर आयेंगे कफ़न ओढ़कर हमको मालूम हुआ न हैं रिश्ता कोई , न कोई नाता यहाँ लाश होते ही हमको उठा ले चले अपने ही घर से कर विदा ले चले चलिये चलते हैं अब ना कभी आएंगे आखरी काफ़िला हैं मेरा तो यहीं आज मैं चल दिया कल को तुम आओगें आज कफ़न ओढ़कर हम जिधर चल दिये आखरी में सभी उधर आयेंगे कवि - महेश "हठधर्मी" प्रिय पाठकों , यदि कविता आपको पसंद आये और आप आगे भी ऐसी कविताएँ पड़ना चाहते हैं तो कृपया हमारे Website को Subscribe करें ताकि कोई भी नयी कविता आने पर आपको तुरंत  Update मिल जाये। आखरी काफिला ( Aakhari Kafeela ) | Hindi poetry कविता जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों का चित्रण हैं। इस कविता में यह कल्पना की गई की अगर मुर्दा व्यक्ति बोल पात...

ठहर जा ऐ जिंदगी ( Thahar Ja E Jindgi ) | Sad Poetry in Hindi

ठहर जा ऐ जिंदगी , क्यों उथल - पुथल मचा रही दो पल तो ठहर जा कभी , बैठूँ कहीं सोचूँ जरा क्या हासिल हुआ , क्या खो दिया हैं बिखरी पड़ी यादें कई , रुक तो जरा समेट लूँ है इनमें कुछ पल खास वो , जो मिले मुझे नसीब से इन्हीं पलों को आँखों में फिर से जरा समेट लूँ चलना तो हैं हमको निरंतर , रुकना नहीं  थकना कहाँ अब जो भी मिले भाग्य में , सहना यहीं जाना कहाँ घड़ियाँ बची जो आखरी , हाथों से फिसले जा रही ठहर जा ऐ जिंदगी , क्यों उथल - पुथल मचा रहीं विश्वास था जिनके साथ का , वो ओझल कहीं पे हो गए कौन लगाता पार नौका , जब स्वयं नाविक नौका डुबो गए पसरा हुआ सन्नाटा अब , गम की कड़कती धुप हैं हैं पाँव में छाले कई , मंजिल अभी भी दूर हैं गुजरा हुआ ये वक्त ना लौटकर फिर आयेगा बस जरा सी यादों में सिमटकर रह जायेगा फिर जानबूझकर , तू क्यों इतना मुझे सता रही ठहर जा ऐ जिंदगी , क्यों उथल - पुथल मचा रहीं कवि - महेश "हठधर्मी" प्रिय पाठकों , यदि कविता आपको पसंद आये और आप आगे भी ऐसी कविताएँ पड़ना चाहते हैं तो कृपया हमारे Website को Subscribe करें ताकि कोई भी नयी कविता आने पर आपको तुरंत ...

दुनियाँ की सच्चाई (Duniyan Ki Sachchaai) | Sad Poetry in Hindi

ऐ दुनिया बता तेरी सच्चाई क्या हैं सबकुछ हैं मिथ्या , सबकुछ झूठा यहाँ हैं लगते हैं सारे चेहरे भोले यहाँ पर हैं नकाब किसपे कैसा किसको पता हैं अपने तो देते यहाँ घांवों पर घाव हरदम शुक्र हैं , लगाने को मरहम कोई तो पराया मिला हैं हैं सच्चाई कैसी , ये कैसी व्यथा हैं जो देता जीवन की राहों में साथ मेरा आज कांटे बिछाते राहों में मिला हैं जो पूछे हम उनसे कुछ तो पूछे भी कैसे कुछ पूछने का बाकि हक, अब बचा ही कहाँ हैं ऐ दुनिया बता तेरी सच्चाई क्या हैं दुखों के डेरे , यहाँ  बिखरे द्वार - द्वार पर कुछ तो बता गया वो प्रेम कहाँ हैं सब कर रहे केवल सिध्द स्वार्थ अपने अपनापन मध्य से गायब हुआ तो कहाँ हैं जो करतें हैं बातें मुहं पर , मधु से भी मीठी चल रहा जहन में उनके , क्या किसको पता हैं हम तो लिये बैठे केवल प्रेम रंग लेकिन चढ़ा किस चेहरे पर , क्या रंग क्या पता हैं ऐ दुनिया बता तेरी सच्चाई क्या हैं कवि - महेश "हठकर्मी" दुनियाँ की सच्चाई   | Sad Poetry in Hindi  इस जहाँ  की वास्तविकता को व्यक्त करने वाली कविता हैं। इस कविता मे...

दर्द - ए - जहाँ (dard-e-janha ) | Sad poetry in Hindi

दर्द पराया हम क्या जाने जिस तन बीती वो तन जाने घाव हरे या गहरे कितने जिस तन लगे वो तन पहचाने तन के घाव तो हैं मिट जाने मन के घाव मिटे तो जाने देंगे साथ कह गये सभी पर जो दे कोई साथ तो हम भी जानें सुख में था संसार साथ पर अब संकट में ना कोई जाने जैसे मिटता पतंगा ज्वाला पर आखिर एक दिन हम भी मिट जाने न हैं कलह किसी से , न हैं बेर यहाँ हम प्रेम के पंछी बन उड़ जानें नहीं रहेंगे हम सदा यहाँ बस कुछ अवशेष शेष रह जाने कवि - महेश "हठधर्मी" दर्द - ए - जहाँ (dard-e-janha ) | Sad poetry in Hindi कविता सांसरिक दुखों की अभी व्यक्ति हैं।  यह कविता काफी तक एक motivatinal poem भी  हैं।  

हल्दीघाटी | Hindi poetry

बरछी से बरछी टकराई , तलवार लड़ी तलवारों  से तब तीर चले तलवार चले , चले भाले पैदल और अश्व सवारों पे चेतक पे राणा हो सवार आ गए रण में रण बाँको से राणा अरिदल पर टूटे ऐसे जैसे सिंह टूट पड़ा मृगछानो पे राणा दल  ने मुगलों के सिरों को काट दिया धरती को शवों से पाट दिया राणा पूछे वो मान कहाँ , जो करता मुगलों का गान यहाँ चेतक भी हवा से बात करे अरिदल पर रण में घात करें मुण्ड कटे गज झुण्ड कटे , धरती शोणित से लाल हुई राणा का साहस देख - देख , मुगल सेना भय से त्रस्त हुई तब ही राणा ने देख लिया मान युद्ध कर रहा हाथी पर जिस स्वाभिमान को गिरवी रख ये मान चढ़ा इस हाथी  पर आज मारकाट इस मान को , उस स्वाभिमान को मुक्त कराऊंगा मुगलों  और मान को मार काट केशरियाँ ध्वजा लहराऊंगा राणा ने मन में ये कर विचार मान पे धावा बोल दिया तब चेतक आगे बड़ा चला अरिदल को पांवों से रोंद दिया चेतक ने लगाई छलांग विकट , पांवों को हाथी मस्तक पर अड़ा दिया तब राणा ने मान को लक्ष्य बना भाले से प्रबल प्रहार किया भाला लक्ष्य से चूक गया टल गया मान प्राणों  से संकट झाला ने ये सब देख लिया , सोंचा...

माँ तुम बिन जीवन की कल्पना भी मैं ना कर पाया

              "माँ" माँ बचपन में पालने में , तुमने मुझे झुलाया माँ  बचपन में अपना दुग्ध , तुमने मुझे पिलाया माँ बचपन में सारी बलाओं से , तुमने मुझे बचाया माँ रात को उठ-उठकर सर्दी में ,तुमने कम्बल मुझे उड़ाया तू वरदान उस ईश्वर का , ये उसने मुझे अहसास दिलाया  माँ प्रथम गुरु तू मेरी , बोलना तुमने मुझे सिखाया जब मैं बोला प्रथम बार ,तो प्रथम माँ ही मेने बुलाया  जब-जब मुझको चोट लगी , मरहम तुमने मुझे लगाया  माँ जब मैं थक हार गया , तब जीत का नवविश्वास तुमने मुझमे जगाया  संसार के छल प्रपंचों से ,अवगत तुमने मुझे कराया माँ सुकर्म की सीख दी मुझको ,इन्सान तुमने मुझे बनाया माँ तुम बिन जीवन की कल्पना भी मैं ना कर पाया माँ जो ना होती तुम तो होती मन पे रिक्तता की छाया माँ हो संसार तुम मेरा ,सब खुशियों को तुमसे ही पाया हो तुम ही वो शक्तिपुंज , जिससे शक्ति जीवन मेरा पाया माँ प्रणाम हो स्वीकार , चरणों में तेरे ईस्वर तक ने...

माँ  तेरी गोद में खेले तूने प्यार लुटाया खूब

माँ  तेरी गोद में खेले तूने प्यार लुटाया खूब माँ  तेरी गोद में खेले तूने प्यार लुटाया खूब माँ जब चोट लगी तो प्यार से सीने से लगाया खूब माँ तूने दुनिया की ठोकरों से हमे बचाया खूब माँ तेरे आंगन के फूलों ने हमे लुभाया खूब माँ तूने हम बच्चों को नीर की जगह अमृत पिलाया खूब माँ जब आंच आई तुझपे तो , हम बन्दुक उठा के चल दिए माँ सारे ऐश्वर्य ,वैभव तुझपे लूटा के चल दिए माँ आज कर्ज़ तेरे हम चूका के चल दिए माँ उठे हुए सरो को हमने झुकने न दिया माँ भले ही आज हम अपने सर कटा के चल दिए माँ वीरता से अपनी ,दुश्मनों के सर झुका के चल दिए माँ प्यार कितना है हमें तुझसे ,ये जग को बता के चल दिए माँ बलिदान पे अपने अपनों को ही नही ,दुश्मनों को अपने रुला के चल दिए माँ लोट के आएंगे तेरी गोद में ये विश्वास दिल में दबाये चल दिए माँ अब अंतिम प्रणाम हो स्वीकार ,रक्त का अपने कण-कण बहा के चल दिए                             ...