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दीवारे ( Diware ) | Hindi Poem | Hindi poetry

मेरे रूम की दीवारे मेरी दोस्त हैं
जब मैं तन्हा होता हूँ इनसे बात करता हूँ
ये सब सुनती हैं,  फिर भी चुप रहती हैं
न कभी ये हँसती हैं मुझ पर, न कभी मुझे चिढ़ाती हैं

कभी जो गुमसुम भी हूँ  मैं
न ये मेरे गम को ठिठोली बनाती हैं
काश इंसान भी इनके जैसा होता
ये पत्थर तो हैं परन्तु पत्थर नहीं हैं

काश इंसान का दिल भी पत्थर न होता
ये मूक हैं कभी बोल नहीं सकती
अपनी भावनाएँ शब्दों में तोल नहीं सकती

काश इंसान भी इनसे कुछ  सिख पाता
अपने शब्दों को तोलकर बोल पाता
ये रूम की छत को उठाये हुए हैं
भार छत का है स्वयं में समाये हुए हैं

काश इंसान भी इन सा बन पाता
भार किसी का भी हो स्वयं उठा पाता
जरुरत में किसी के काम आता
ये दीवारे मुझे बहुत कुछ सिखाती रहती हैं
दोस्त जो ठहरी राहें बताती रहती हैं


कवि - महेश "हठधर्मी"

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 दीवारे ( Diware ) | Hindi Poem | Hindi poetry कविता एक Inspirational Kavita है। जिसमे प्रकति में उपस्थित वस्तुओ से जो कुछ हम सिख सकते हैं का चित्रण किया गया हैं। 

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